मेष संक्रांति का पर्व क्यों है खास? और क्या है इसका महत्त्व?

Editorial Team
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प्रत्येक साल में कुल 12 संक्रांति होती हैं लेकिन इन सब में सबसे ज़्यादा महत्व मेष संक्रांति को दिया जाता है। इस संक्रांति में सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए इस संक्रांति को मेष संक्रांति के नाम से जाना जाता है। इस ख़ास दिन को जो बात और ख़ास बनाती है वो यह कि मेष राशि में सूर्य का आना इस वजह से भी शुभ माना ही गया है क्योंकि यह दिन सौर वर्ष या सोलर ईयर का पहला दिन होता है. यानि कि सोलर ईयर की शुरुआत मेष संक्राति के साथ होती है।सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि में प्रवेश करने की घटना को संक्रांति कहते हैं।

इस दिन के बारे में कहा जाता है कि ये वो दिन होता है जब सूर्य देवता मेष राशि में संक्रमण करते हैं और इसी दिन से सौर वैशाख मास की शुरुआत होती है।मेष संक्रांति से ही भगवान सूर्य उत्तरायण का आधा सफर पूरा करते हैं। भारत में इस दिन को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है। अन्य संक्रांति की तरह इस दिन भी स्नान-दान, पितरों का तर्पण और मधुसूदन भगवान की पूजा का बहुत महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार मेष संक्रांति के दिन स्नान दान का विशेष महत्व माना जाता है। मेष संक्रांति के दिन ही सूरज देव उत्तरायण की अभी यात्रा को पूरा करते हैं। भारत में अलग-अलग जगहों पर मेष राशि को अलग अलग नाम से जाना जाता है। बंगाल में रहने वाले लोग मेष संक्रांति को नए साल के रूप में मनाते हैं।

मेष संक्रांति के दिन सूरज देव की पूजा अर्चना करने के साथ गुड और सत्तू खाने का नियम होता है। बिहार राज्य में मेष संक्रांति के दिन हो सतुआ के रूप में मनाया जाता है।

सत्तू संक्रांति क्यों कहा जाता है?

सत्तू संक्रांति के दिन घर में खाना ना बनाने कि प्रथा है। इस दिन घर के सभी सदस्य सत्तू का सेवन करते हैं। इस दिन सत्तू का दान भी किया जाता है। दरअसल, सोलर कैलेंडर के अनुसार, सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ गर्मी के मौसम कि शुरुआत मानी जाती है। यही वजह है कि लोग ऐसा आहार लेते हैं जो शीतलता दे और सुपाच्य भी हो। इस दिन जल, मिट्टी के घड़े, स्नान, तिलों द्वारा पितरों का तर्पण तथा कृष्ण भगवान की पूजा अर्चना का भी विशेष महत्व है।

मेष संक्रांति की पूजा विधि क्या है ?

मेष संक्रांति के दिन सूरज देवता को जल देने का विशेष महत्व माना जाता है।

इस दिन सुबह जल्दी उठकर नित्यक्रियाओं से निवृत्त होने के बाद किसी पवित्र नदी में स्नान किया जाता है।

यदि घर के आसपास कोई पवित्र नदी ना हो तो घर में ही पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान किया जाता है।

इस दिन स्नान करने के बाद लाल रंग के वस्त्र धारण किए जाते हैं।

इसके बाद तांबे के लोटे में जल भरकर इसमें लाल चंदन, थोड़ा कुमकुम और लाल फूलों या गुलाब की पत्तियां मिलाई जाती हैं।

तांबे के लोटे में जल भरकर पूरब दिशा की ओर मुंह कर के दोनों हाथों से लोटे को अपने सर से ऊपर की ओर उठा कर धीरे धीरे जल की एक धारा बनाई जाती है।

इस तरह सूरज देव को 7 बार जल अर्पित किया जाता है।

यदि सूरज देवता को घर पर ही अर्घ्य दे रहे हैं, तो जहां पर जल गिरेगा वहां किसी बर्तन या बाल्टी को रखा जाता है।

ऐसा करने से जमा हुआ जल को किसी गमले पौधे या पेड़ की जड़ में डाल दिया जाता है।

सूरज देव को जल अर्पित करते समय गायत्री मंत्र का जाप किया जाता है।

यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूरज नीचे के स्थान पर है, तो उसे मेष संक्रांति के दिन दान पुण्य करना चाहिए।

मेष संक्रांति के दिन गरीब और जरूरतमंदों को गेहूं, गुड और चांदी का दान देना शुभ माना जाता है ।

संक्रांति का महत्व

  • संक्रांति का सीधा संबंध खेती, प्रकृति, और मौसम के बदलने से जोड़ कर देखा जाता है और सूर्य देव को प्रकृति के कारक के तौर पर भी जाना जाता है। ऐसे में इस दिन सूर्य पूजा का बहुत महत्व बताया गया है।
  • संक्रांति के दिन पूजा-पाठ के बाद तिल का प्रसाद बांटा जाता है।
  • संक्रांति के दिन का बहुत महत्व बताया गया है जिसके चलते कई जगह पर लोग इस दिन पूजा-पाठ और व्रत इत्यादि भी करते हैं। मत्स्यपुराण में संक्रांति के व्रत का वर्णन भी किया गया है।
  • कहा जाता है कि जिस भी इंसान को संक्रांति का व्रत रखना हो उसे एक दिन पहले सिर्फ एक समय ही भोजन करना चाहिए।
  • संक्रांति वाले दिन साधक को सुबह जल्दी उठकर दांतों को अच्छे से साफ करके स्नान करना चाहिए।
  • इस दिन आपको नहाने के पानी में तिल ज़रूर मिला लेना चाहिए।
  • पूजा-पाठ के बाद दान आदि देने का महत्व गया है।
  • इसके अलावा इस दिन बिना तेल का भोजन करना चाहिए और अपनी यथाशक्ति से दूसरों को भी भोजन देना चाहिए।
  • संक्रांति के दिन गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान महापुण्यदायक माना गया है। ऐसा करने वाले इंसान को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

उत्तराखंड में बेहद ख़ास महत्व है मेष संक्रांति का

वैसे तो मेष संक्रांति देश के सभी हिस्सों में बड़े ही पैमाने पर मनाई जाती है लेकिन उत्तराखंड में इस त्यौहार का अलग ही रंग देखने को मिलता है। उत्तराखंड में मेष संक्रांति के दिन एक पत्थर को दैत्य का प्रतीक माना जाता है और फिर उसकी जमकर पिटाई की जाती है। इसके बाद भगवान से सभी के कल्याण प्राप्ति की कामना की जाती है। इसके बाद पारंपरिक नृत्‍य और गीत-संगीत का आयोजन किया जाता है। और फिर सभी लोग एक-दूसरे को गले मिलते हैं और एकदूसरे को इस पर्व की बधाई देते हैं।

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