Shardiya Navratri 2025: नवरात्रि के नौ दिन नौ देवियों की ऐसे करें पूजा, मिलेगा माता का आशीर्वाद

Editorial Team
23 Min Read
Shardiya Navratri 2025

नवरात्र शब्द से नव अहोरात्रो का बोध होता है इस समय शक्ति के नौ रूपों की उपासना की जाती है रात्रि शब्द सिद्धि का प्रतीक है। मनीषियों  ने वर्ष में चार नवरात्रों का विधान बनाया है। जिसमें दो महत्वपूर्ण है यह नवरात्र विक्रम संवत के पहले दिन चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक और इसी प्रकार ठीक 6 मार्च बाद अश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक या विजयादशमी से एक दिन पूर्व तक होते हैं। सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रि को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए लोग अनेक प्रकार के व्रत संयम नियम यज्ञ भजन पूजन योग साधना आदि करते हैं कुछ साधन इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मित्रों के जब द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

इस वर्ष नवरात्रि का आरंभ 22 सितंबर सोमवार को होगा प्रतिपादन तिथि भी पूरे दिन रहेगी इसीलिए इस दिन कलश का स्थापना होगा और 1 अक्टूबर को महानवमी का पूजन होगा आगमन प्रतिपदा मातनुसार या ’ मूलन आवाहायेत देवी श्रावणॆ तु विसर्जयेत’ के मातनुसार दोनों ही सोमवार को होने से गज वहां से देवी का आगमन होगा जो की अच्छी वर्षा का संकेत है गमन झूला के साथ होने से सभी के लिए शुभकारी रहेगा ।28 सितंबर की सायं देवी का बोधन आमंत्रण और अधिवास होगा। सप्तमी पूजन में सरस्वती का आवाहन 29 सितंबर सोमवार को होगा। इसी दिन रात में कालरात्रि का दर्शन महानिशा पूजन भी होगा। 2 अक्टूबर बृहस्पति को विजयदशमी मनाई जाएगी इसी दिन प्रतिमा विसर्जन भी होगा।

पहले दिन मां शैलपुत्री से आशीर्वाद

नवरात्र पूजन के पहले दिन कलश पूजन के साथ मां शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। सेल राज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है। मां शैलपुत्री हाथ में त्रिशूल और एक हाथ में कमल का पुष्प लिए हुए हैं। इनका वाहन वृषभ है। भक्तों में मां शैलपुत्री का महत्व और आराधना विशेष रूप से इनकी पूजा से परिवार में सुख समृद्धि और खुशहाली आती है । इनकी पूजा से मानसिक तनाव दूर होता है। शैलपुत्री का पूजन करने से मूलाधार चक्र जागृत होता है। शैलपुत्री का पूजन करने से जीवन में स्थिरता और रिश्तो में मजबूती आती है, जिससे परिवार में सौहार्द एवं प्रेम बढ़ता है साधक इस दिन केसरिया वस्त्र पहनते हैं मनोविकारों से बचने के लिए मन को सफेद कनेर का फूल चढ़ाते हैं।

मंत्र : या देवी सर्वभूतेषु मां शैलपुत्री रुपेण संस्थिता । न नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।। वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्। वृषारूढा शुल् शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ।।

इन दोनों में से किसी एक मंत्र का जाप करते हुए मां का पूजा करें।

मां शैलपुत्री
मां शैलपुत्री

कैसे करें पूजा

देवी दुर्गा, गणेश जी, नवग्रह, कुबेर की मूर्ति के साथ कलश स्थापना करें। पूर्व के कोण की तरफ या आंगन के पूर्वोत्तर भाग में पृथ्वी पर सात प्रकार के अनाज रखें। कलश में गंगा जल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, कलावा, चंदन, अक्षत, हल्दी, पुष्प डालें। कलश को सात अनाजों सहित रेत के ऊपर स्थापित करें। कलश को जल या गंगा जल से भर दें। आम, पीपल, बरगद, गूलर, पाकड़ में से किसी का पल्लव कलश के ऊपर रखें। जौ या कच्चा चावल कटोरे में भरकर कलश के ऊपर रखें। उसके ऊपर चुन्नी में लिपटा नारियल रखें। हाथ में हल्दी, अक्षत, पुष्प लेकर संकल्प लें। दीप पूजन करें। सभी पूजन सामग्री अर्पण करते हुए मां की पूजा करें। माता को फल अर्पित करें और फलाहार करें।

 

मां का शांत रूप ब्रह्मचारिणी

देवी ब्रहमचारिणी का स्वरूप अत्यंत ही दिव्य है। देवी भवनों को यह संदेश देती हैं कि जीवन में बिना तपस्या यानी कठोर परिश्रम के सफलता नहीं प्राप्त की जा सकती। मां मूल रूप से तपस्विनी हैं। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इन्होंने हजारों वर्ष तक घोर तपस्या की और जंगल के फलों-पतों को खाकर अपनी साधना पूरी की तया शिव को प्राप्त किया। इसलिए इनका स्वरूप बहुत ही सादा और भया है। इनके एक हाथ में कमंडल और दूसरे हाथ में चंदन की माला है। प्रसन्न मुद्रा में माता अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। ब्रहम धारयितुम शीलं यस्या मा ब्रहमचारिणी, अर्थात जो ब्रहम ज्ञान दिला कर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करें, वे ही मां ब्रह्मचारिणी हैं। साधक इस दिन मन को मां के श्रीचरणों में एकाग्रचित करके स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित करते हैं। मां की कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त व्रत-अनुष्ठान और साधना करते हैं।

मंत्र : दधाना कपद्‌माभ्यामक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुतमा ।।

अथवा आप इस मंत्र का भी जाप कर सकती हैं- ॐ ब्रहमचारिण्यै नमः। इस मंत्र का जाप आप 108 बार करें।

मां का शांत रूप ब्रह्मचारिणी
मां का शांत रूप ब्रह्मचारिणी

कैसे करें पूजा

अन्य देवियों की तुलना में यह अति सौम्य, क्रोधरहित और तुरंत वरदान देने वाली देवी हैं। देवी मां को सफेद वस्त्र पहनाकर फल, फूल एवं धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें। विधिवत पूजा करने के बाद आरती करने का विधान है। या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्वस्यै नमो नमः ।। इस सरल मंत्र द्वारा पूजा के लिए लाए गए पदार्थों को अर्पित करें। मां को दूध से बनी चीजें अर्पित करें और दूध, दही एवं पनीर का आहार लें। साथ ही प्रसाद वितरण करें। इस दिन लाल वस्त्र धारण करके देवी की आराधना करें। शक्ति प्राप्ति के लिए मां ब्रह्मचारिणी को सिंदूर का चोला चढ़ाएं।

 

शिवदूती स्वरूप मां चंद्रघंटा

नवरात्र के तीसरे तीन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। मां का यह रुप बेहद सुंदर, मोहक और अलौकिक है। चंद्र के समान सुंदर मां के इस स्वरूप से दिव्य सुगंधियों और दिव्य ध्वनियों का आभास होता है। शक्ति का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। दस भुजाओं वाली माता सिंह यानी शेर पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान हैं। मां के इन दस हाथों में ढाल, तलवार, खड्ग, त्रिशूल, धनुष, चक्र, पाश, गदा और वाणों से भरा तरकश है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्रमा सुशोभित है। इनका मुखमंडल शांत, सात्विक, सौम्य, किंतु सूर्य के समान तेज वाला है। माता चंद्रघंटा की उपासना से सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है, साथ ही प्रेत बाधाओं से सुरक्षा मिलती है। योग साधना की सफलता के लिए भी माता चंद्रघंटा की उपासना बहुत असरदार है। इस दिन पीले रंग के सुंदर कपड़े पहनकर मां की पूजा करें। लाल पुष्पों से मां की आराधना करें। इसके बाद सपरिवार मां की आरती करें। इस दिन कुट्टू के आटे का आहार लेना शास्त्र सम्मत है।

मंत्र : या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रुपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

मां चंद्रघंटा
मां चंद्रघंटा

कैसे करें पूजा

मन, वचन, कर्म एवं काया को विधि-विधान के अनुसार शुद्ध करके मां चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। पूजन का संकल्प लेकर वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां चंद्रघंटा सहित समस्त स्थापित देवताओं की पोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दूर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। इसके बाद प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें। प्रेम में सफलता के लिए मां चंद्रघंटा को चमेली का इत्र चढ़ाएं।

 

सिद्धियां देने वाली मां कूष्मांडा

माना जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व ही नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा यानी आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में हैं। वहां निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभामंडल भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान है। इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित होती हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है। मां की आठ भुजाएं हैं। अतः ये अष्टभुजा देवी के नाम से भी जानी जाती हैं। इनके हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष-बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं, जबकि आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। मान्यता है कि मां कूष्मांडा की पूजा से अनाहत चक्र जाग्रत होता है। शास्त्रानुसार इनकी पूजा देर रात में करनी चाहिए। इनके पूजन से सारे शोक खत्म हो जाते हैं। इस दिन बच्चों की नजर उतारने की परंपरा है।

मंत्र : या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रुपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

मां कूष्मांडा
मां कूष्मांडा

कैसे करें पूजा

कलश और उसमें उपस्थित देवताओं की पूजा करें। फिर माता के साथ अन्य देवी-देवताओं की पूजा करें। व्रत और पूजन का संकल्प लेकर सप्तशती मंत्रों द्वारा मां कूष्मांडा सहित समस्त स्थापित देवी-देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। पूजा शुरू करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम करें और पवित्र मन से ध्यान करते हुए मंत्र का जाप करें। हरे रंग के वस्त्र धारण करें। साग-सब्जियों का सेवन करें। कुछ समय मौन भी रहें। संतति सुख की प्राप्ति के लिए मां कूष्मांडा को जायफल चढ़ा सकती हैं। इन्हें लाल रंग प्रिय है, अतः मां के सामने लाल रंग का आसन बिछाएं। इसके बाद मां का ध्यान करें। नवरात्र के चौथे दिन पौधों की सेवा करना भी मां की आराधना का ही एक रूप है।

अज्ञान मिटाने वाली मां स्कंदमाता

नवरात्र के पांचवें दिन देववासुर संग्राम के सेनापति भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेय जी की माता स्कंदमाता की आराधना होती है। कमल पुष्प के आसन पर विराजमान होने से इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। चेहरे पर विशेष तेज लिए देवी स्कंदमाता सिंह पर सवार रहती हैं। इनकी गोद में विराजमान हैं, इन्हीं की सूक्ष्म स्वरूप छह सिर वाली देवी। इनकी चार भुजाएं हैं। दो हाथों में कमल पुष्प सुशोभित हैं, एक हाथ वर मुद्रा में है और एक हाथ से अपनी गोद में विराजमान स्कंद को संभाले हुए हैं। सूर्यमंडली की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। भवसागर के दुखों से मुक्ति पाकर सुलभ मार्ग बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है। यह देवी समस्त ज्ञान, विज्ञान, धर्म-कर्म और कृषि उद्योग सहित पंच आवरणों से समाहित विद्यावाहिनी दुर्गा भी कहलाती हैं। मां अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। कहते हैं कि इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी बन जाता है।

मंत्र : सिंहासनगता नित्यं प‌द्माश्रित करद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्वी ।।

स्कंदमाता
स्कंदमाता

कैसे करें पूजा

लकड़ी की चौकी पर पीले रंग का नया वस्त्र बिष्ठाकर कुमकुम से ‘ॐ’ अंकित करें। उस पर स्कंदमाता की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। चौकी पर मनोकामना गुटिका रखें। पूजन में पीले रंग के पुष्प, वस्त्र एवं पीले रंग के खाद्य पदार्थ प्रसाद के रूप में अर्पित करें। स्कंदमाता की पूजा में अलसी भी चढ़ाई जाती है। प्रार्थना, भजन, कीर्तन और मंत्र जप से मां को प्रसन्न करें। पूजन के बाद सपरिवार आरती करें। फिर श्रद्धानुसार कन्या और लांगुरों को भोजन कराएं। उपाहार में उन्हें फल, धन आदि भेंट करें। पूजन में रंग-बिरंगे वस्त्र पहनें। मां को चुनरी चढ़ाना लाभदायी है। स्कंदमाता की कथा सुनें और जागरण करें। फलाहार में मखाने की खीर खाएं। संतान की सफलता के लिए मां को मेहंदी अर्पित करें।

 

भय मुक्त करती हैं मां कात्यायनी

माता भगवती का छठा अवतार हैं कात्यायनी। इनकी पूजा छठे दिन की जाती है। हैं। छठे दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित रहता है। मां कात्यायनी का स्वरुप अत्यंत दिव्य है। इनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है। इनकी चार भुजाएं हैं। दो हाथों में तलवार एवं कमल पुष्प सुशोभित हैं और दो हाथ वर और अभय मुद्रा में भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। इनका वाहन सिंह है। मां कात्यायनी की भक्ति और उपासना से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। रोग, शोक, संताप, भय आदि सभी नष्ट हो जाते हैं। मान्यता है कि महर्षि कात्यायन ने मां भगवती को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा के साथ वन में कठोर तपस्या की थी। महर्षि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती ने उन्हें पुत्री का वरदान दिया। इसके बाद महिषासुर नामक राक्षस के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए त्रिदेवों के तेज से एक कन्या का जन्म हुआ, जिसने असीम शक्ति और तेज के बल पर महिषासुर का अंत किया। कात्य गोत्र में जन्म लेने के कारण देवी भगवती कात्यायनी कहलाई।

मंत्र : चंद्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दध्यतिवि दानवघातिनी ।।

मां कात्यायनी
मां कात्यायनी

कैसे करें पूजा

लकड़ी से निर्मित चौकी पर लाल वस्त्र बिठाकर उस पर कात्यायनी की मूर्ति या चित्र स्थापित करके शुद्ध घी का दीपक पूजन पूरा होने तक प्रज्वलित रखें। ऊपर लिखे मंत्र का जप करते हुए लाल कनेर, गुड़हल, लाल गुलाब या लाल कमल अर्पित करें। षोडशोपचार विधि से पूजन के बाद आरती करें। इनकी पूजा करते समय ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ या ‘ॐ कात्यायनी देव्यै नमः’ मंत्र का उच्चारण करें। प्रसाद में शहद का उपयोग करें। पूजन के बाद कन्याओं को प्रसाद, भेंट आदि देकर प्रसन्न करें। सुख-शांति के लिए मां कात्यायनी पर साबुत हल्दी चढ़ा सकती हैं। इससे मां की सहज कृपा प्राप्त होती है। इनकी आराधना के लिए केसरिया या वसंती रंग का वस्त्र धारण करें।

 

शुभ फल देने वाली मां कालरात्रि

मां कालरात्रि दुष्टों का नाश करने वाली देवी हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से भयभीत हो जाते हैं। इनका रंग काला एवं बाल बिखरे हुए हैं। इनके तीन नेत्र एवं चार भुजाएं हैं। गर्दभ इनका वाहन है और ये दाहिने हाथों में तलवार तथा नरमुद्रा एवं बाएं हाथ में ज्वाला तथा अभय मुद्रा धारण करती हैं। ऊपर से भयानक, परंतु अंतराल में स्नेह का भंडार हैं। इनके गले में विद्युत जैसी छटा देने वाली सफेद माला सुशोभित रहती है। मां कालरात्रि का स्वरूप भयानक हैं, लेकिन वे भक्तों को शुभ फल देती हैं। भयानक स्वरूप होने के बावजूद शुभ फल देने वाली मां कालरात्रि को इसी गुण के कारण ‘शुभंकरी’ भी कहा जाता है। यह देवी जीवन में आने वाली सभी ग्रह-बाधाओं को दूर करती हैं। सृष्टि संचालन और सृष्टि संयोजन इन्हीं मां काली की कृपा का फल हैं। जिन वस्तुओं और प्राणियों से जीव दूर भागता है, वे मां काली को प्रिय हैं। इनकी पूजा-अर्चना करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और दुश्मनों का नाश होता है। इनकी पूजा में जागरण का विशेष महत्व बताया गया है।

मंत्र : ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ।।

कैसे करें पूजा

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके मां कालरात्रि का ध्यान करें। चुनरी पहनकर रंग-बिरंगे पुष्पों से इनकी पूजा करें। नवग्रह, दशदिग्पाल, अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते हुए मां कालरात्रि की पूजा करें। पूजा शुरू करने पर हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर उनके मंत्र का ध्यान करें। गुलाब, गुड़हल आदि फूलों से मां का श्रृंगार करें। गंधाक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य- पांच प्रकार की सामग्री द्वारा पंचोपचार पूजन करें। ऊपर लिखे मंत्र का 108 के क्रम में जाप करें। फिर मां काली की आरती करें। अगर उपवास रखती हैं तो फलाहार पर रहें। मृत्यु भय से मुक्ति के लिए मां को काले चने अर्पित करें। पापों से मुक्ति के लिए मां को गुड़ का नैवेद्य चढ़ा सकती हैं और उसे ब्राह्मण को दान कर दें।

 

सुख-संपदा की देवी मां महागौरी

वरात्र का आठवां दिन शरीर का सोम चक्र जाग्रत करने का दिन है। महागौरी की आराधना से यह चक्र जाग्रत होता है। महागौरी की उत्पत्ति की कथा मां पार्वती से ही जुड़ती है। कथा अनुसार, पार्वती के रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस कठोर तप के कारण उनकी देह क्षीण और वर्ण काला पड़ गया। अंत में इनकी तपस्या से संतुष्ट होकर जब भगवान शिव ने इन्हें अपनी जटा से निकलती पवित्र गंगाधारा के जल से धोया तो यह विद्युत प्रभा के समान अति कांतिमान और गौर वर्ण की हो गई। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ गया। देवी दुर्गा ने महिषासुर राक्षस पर विजय पाई, इसलिए अष्टमी के दिन देवी दुर्गा के गौरी रूप की पूजा होती है। इनकी पूजा विवाहित महिलाओं को विशेष फल प्रदान करती है। गौर वर्ण-चाली इस देवी का वाहन हिम के समान सफेद रंग वाला वृषभ अर्थात बैल है। इनके सारे वस्त्र एवं आभूषण सफेद हैं। चार भुजा वाली इस मां के हाथ में त्रिशूल है तो दूसरे में डमरु। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।

मंत्र : श्वेत हस्ति समारूढ़ा, श्वेताम्बर धरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्याद् महादेव प्रमोददा।।

मनोकामनाएं करें पूरी मां सिद्धिदात्री

दुर्गा का नवें रूप का नाम है सिद्धिदात्री। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। इनके हाथों में चक्र, शंख, गदा, कमल, पुष्प है। सृष्टि की कोई वस्तु इनसे प्राप्त की जा सकती है। मां भगवती इस दिन भक्तों की सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं, लौकिक एवं परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं को पूरा करती हैं। चार भुजाओं वाली इस देवी का वाहन सिंह है और इनका आसन कमल है। इनकी उपासना नवरात्र में नवमी तिथि में की जाती है। इस दिन माता सिद्धिदात्री की उपासना से उपासक की सभी सांसारिक इच्छाएं और आवश्यकताएं पूरी होती हैं। देवी पुराण के अनुसार, भगवान शंकर ने भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। केवल मानव ही नहीं, सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, देवता और असुर, सभी इनकी आराधना करते हैं। इनका स्वरूप मां सरस्वती का भी स्वरुप माना जाता है। यदि सपरिवार इनकी आरती की जाए तो भक्त की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। आहार में इस दिन पूरी-हलवा, चना-साग आदि बनाने का विधान है।

मंत्र : या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रुपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

कैसे करें पूजा

इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है। हवन करते वक्त सभी देवी-देवताओं के नाम से आहूति दें। बाद में माता के नाम से आहूति दें। दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोकों के साथ आहूति दी जा सकती है। ऊपर लिखा देवी का बीजमंत्र पढ़ें, जिसका अर्थ है- मां सिद्धिदात्री के रूप में सर्वत्र विराजमान मां अंबे, आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। हे मां, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ। सब भगवान की पूजा करते हुए अंत में आहुति देकर आरती करें। देवी के बीज मंत्र ‘ऊं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमो नमः’ से कम-से-कम 108 बार हवि दें। प्रसाद को लोगों में बांट दें। कन्या पूजन करें। मोक्ष की प्राप्ति के लिए मां सिद्धिदात्री को केला अर्पित करें। नौवें दिन मां का पूजन करने के बाद ही व्रत का पारायण करें।

 

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *