भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी कहा जाता है। वे देवताओं के वास्तुकार, शिल्पकार और तकनीकी ज्ञान के अधिष्ठाता माने जाते हैं। सृष्टि के निर्माण, भव्य नगरों की स्थापना और दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की रचना में उनकी भूमिका अद्वितीय है। जिस प्रकार ब्रह्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति की, उसी प्रकार विश्वकर्मा ने उसे आकार और स्वरूप प्रदान किया।
भगवान विश्वकर्मा का पौराणिक परिचय
शास्त्रों में विश्वकर्मा को प्रजापति कहा गया है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में उनका उल्लेख मिलता है। उन्हें सृष्टि के प्रथम अभियंता (Engineer) और वास्तुकार (Architect) के रूप में जाना जाता है। विश्वकर्मा को सृष्टि का कारीगर कहा जाता है, जिन्होंने देवताओं के लोक, राजमहल, मंदिर, रथ, और अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया।
देवशिल्पी की अद्भुत रचनाएँ
1. स्वर्ण लंका का निर्माण
त्रेतायुग की सबसे महान नगरी सोने की लंका विश्वकर्मा की ही देन थी। कहा जाता है कि महादेव भगवान शिव की आज्ञा से उन्होंने लंका का निर्माण किया था। यह नगरी सोने से निर्मित थी, जिसके महल, द्वार और दीवारें सब स्वर्णमयी थीं। बाद में यह लंका राक्षसराज रावण को मिली और वहीं राम-रावण युद्ध की पृष्ठभूमि बनी।
2. द्वारका का निर्माण
द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने जब मथुरा से द्वारका को राजधानी बनाया, तब उन्होंने विश्वकर्मा को नगर निर्माण का कार्य सौंपा। समुद्र के किनारे स्थित द्वारका नगरी अपने अद्वितीय सौंदर्य और भव्यता के लिए प्रसिद्ध थी। कहा जाता है कि इस नगर में 900 से अधिक भव्य महल थे और प्रत्येक मोती, सोने और कीमती रत्नों से सुसज्जित था।

3. इन्द्रपुरी और स्वर्गलोक
इन्द्रदेव का दिव्य नगर इन्द्रपुरी (अमरावती) भी विश्वकर्मा की ही रचना मानी जाती है। यह नगर नंदनवन, दिव्य राजमहलों और स्वर्णमयी सभाओं से सुसज्जित था। यहाँ देवगण रहते थे और यहीं से इन्द्रदेव स्वर्गलोक का संचालन करते थे।
4. हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ
महाभारत काल की नगरी हस्तिनापुर और पांडवों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। इन्द्रप्रस्थ का मायावी सभा भवन इतना अद्भुत था कि वहाँ जल और भूमि के बीच अंतर करना कठिन हो जाता था। यहीं दुर्योधन जल में गिर पड़े थे, जिससे महाभारत युद्ध की नींव पड़ी।
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित अस्त्र-शस्त्र
भगवान विश्वकर्मा केवल नगरों और भवनों के निर्माता ही नहीं थे, बल्कि देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों के शिल्पकार भी थे।
- भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र विश्वकर्मा ने ही बनाया।
- भगवान शिव का त्रिशूल उनकी ही कृति है।
- इन्द्रदेव का वज्र, जो असुरों के संहार के लिए प्रसिद्ध हुआ, भी विश्वकर्मा की ही देन है।
- इसके अलावा अनेक दिव्य रथ, जैसे सूर्यदेव का रथ और पुष्पक विमान भी उन्होंने ही तैयार किया।
विश्वकर्मा का महत्व
भगवान विश्वकर्मा को कर्मकुशलता और नवाचार का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने न केवल देवताओं के लिए अद्भुत रचनाएँ कीं, बल्कि मनुष्यों को भी निर्माण और तकनीक की शिक्षा दी। आज भी कारीगर, शिल्पकार, इंजीनियर और तकनीकी कार्य से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा को अपना आराध्य मानकर पूजा करते हैं।
भगवान विश्वकर्मा का पौराणिक इतिहास भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। उन्होंने लंका, द्वारका, इन्द्रपुरी, हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ जैसे भव्य नगर बनाए और देवताओं को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। उनकी हर रचना में कला, विज्ञान और तकनीकी ज्ञान का अद्भुत समन्वय दिखता है। यही कारण है कि आज भी विश्वकर्मा पूजा पूरे भारत में उत्साहपूर्वक मनाई जाती है, विशेषकर शिल्पकारों और इंजीनियरों द्वारा।