नवरात्रि हिंदू धर्म का सबसे प्रमुख पर्व है, जिसमें देवी दुर्गा की नौ स्वरूपों में आराधना की जाती है। इस पर्व की शुरुआत कलश स्थापना यानी घटस्थापना से होती है। कलश स्थापना नवरात्रि की प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण विधि है क्योंकि इसे देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा की दिव्य ऊर्जा कलश में विराजमान रहती हैं और घर-परिवार को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
कलश स्थापना का महत्व
कलश हिंदू धर्म में सृष्टि और जीवन ऊर्जा का प्रतीक है। इसे ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप कहा जाता है।
- कलश का गोल आकार पृथ्वी का प्रतीक है।
- इसके ऊपर रखा नारियल जीवन शक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
- आम के पत्ते पंचतत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- कलश के अंदर रखा जल देवताओं की ऊर्जा को धारण करता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति कलश की स्थापना करता है, तो वह घर में सभी देवी-देवताओं का आह्वान करता है। इसीलिए नवरात्रि की पूजा का शुभारंभ कलश स्थापना से ही किया जाता है।

नवरात्रि 2025 में कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, 2025 में शारदीय नवरात्रि का आरंभ 22 सितंबर (सोमवार) से होगा।
- कलश स्थापना का मुहूर्त: प्रातः 6:09 से 8:06 बजे तक शुभ है।
- यदि यह समय उपलब्ध न हो तो दूसरा मुहूर्त 11:49 से 12:38 बजे तक रहेगा।
यह समय अभिजीत मुहूर्त और प्रदोषकाल के आधार पर सबसे उत्तम माना गया है। इस दौरान कलश स्थापना करने से पूरे नौ दिन मां दुर्गा की कृपा घर में बनी रहती है।
कलश स्थापना की विधि और सामग्री
कलश स्थापना के लिए आवश्यक सामग्री:
- मिट्टी का कलश या तांबे का पात्र
- शुद्ध गंगाजल
- आम के 5 पत्ते
- नारियल
- मौली (लाल धागा)
- रोली, अक्षत, सिंदूर
- जौ या गेहूं के बीज
- लाल कपड़ा
- पान के पत्ते, सुपारी, सिक्का
विधि:
- सबसे पहले पूजा स्थान को शुद्ध जल से साफ करें।
- पवित्र मिट्टी (बालू) में जौ के बीज बोकर उस पर कलश स्थापित करें।
- कलश में गंगाजल भरें और उसमें थोड़ी सी सुपारी, सिक्का और पंचरत्न डालें।
- कलश के मुख पर आम के 5 पत्ते लगाएं।
- नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर मौली से बांधें और उसे कलश पर रखें।
- देवी दुर्गा का ध्यान करके मंत्रोच्चारण करें –
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” - अंत में दीपक जलाकर पूजा का आरंभ करें।
रीति-रिवाज और मान्यताएँ
- जौ बोना: नवरात्रि में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा है। नौवें दिन जौ के अंकुरित पौधे मां दुर्गा की कृपा का प्रतीक माने जाते हैं। इन्हें विजयादशमी पर घर में स्थापित किया जाता है।
- अखंड ज्योति: कलश स्थापना के साथ अखंड ज्योति जलाने की परंपरा है। मान्यता है कि यह ज्योति पूरे घर को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करती है।
- व्रत नियम: कलश स्थापना करने वाले व्यक्ति को पूरे नवरात्रि संयम और सात्विक भोजन का पालन करना चाहिए।
- प्रतिदिन पूजा: नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा कलश के सामने की जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से कलश का महत्व
कलश को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।
- कलश में भरे जल से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा फैलती है।
- नारियल को ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक माना जाता है।
- जब भक्त पूरे श्रद्धा भाव से कलश स्थापना करता है, तो यह साधना और ध्यान का माध्यम बन जाता है।
कलश विसर्जन
नवरात्रि के अंतिम दिन यानी नवमी या दशमी को कलश विसर्जन किया जाता है। कलश के जल और अंकुरित जौ को घर की तुलसी या किसी पवित्र स्थान पर विसर्जित कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया जीवन में नए आरंभ और शुभ ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है।
नवरात्रि में कलश स्थापना केवल पूजा की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह शक्ति, समर्पण और शुभता का आह्वान है। शुभ मुहूर्त में की गई घटस्थापना परिवार में सुख-समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा लाती है। इसके साथ जुड़ी परंपराएं हमें यह सिखाती हैं कि शक्ति का सही उपयोग और संयम जीवन को सफल बनाता है।