प्रयागराज में चल रहे विराट धार्मिक महोत्सव में पूरे विश्व भर से आ रहे श्रद्धालुओं का आस्था, समर्पण, भाव और भक्ति से भगवान की प्राप्ति हेतु संगम हो रहा है । आश्चर्य की बात है कि दुनिया के सभी देशों ने अपने अपने तीर्थ बनाये है। उन संप्रदायों के जो अपने धर्मों की संज्ञा दी है उनके भी अपने अपने तीर्थ हैं जो अपने धार्मिक मंदिरों के पक्ष में नहीं थे और उनके भी हैं जो मूर्तिपूजक भी नहीं थे ।
इतिहास गवाह है कि जैन, सिख, बौद्ध, ईसाई, मुसलमान मूर्तिपूजक नहीं थे परंतु इन्हें भी तीर्थ निर्मित करने ही पड़े थे। सच तो यह है कि बिना तीर्थ के धर्म का कोई अर्थ नहीं रह जाता और प्रयाग ऐसा पावन तीर्थ स्थल है जो तीर्थराज के नाम से भी प्रचलित है। इसलिये तीर्थ व्यक्ति नहीं है, कोई एक मंदिर, मस्जिद ,गिरजाघर और गुरुद्वारा नहीं है बल्कि यह एक ईश्वरीय शक्ति का ब्रह्मनाद स्वरूप ‘समूह प्रयोग’ ( Mass Experiment) है ताकि अधिकतम विराट पैमाने पर उस अनंत दैवीय शक्ति को महसूस किया जा सके और प्रयाग के संगम तट पर लगने वाले माघ के महीने में जो तीर्थ-चक्र निर्मित होता है वह इसका सबसे बड़ा प्रमाण है जहां समुद्र मंथन के समय अमृत की बूंदें इस पवित्र स्थल पर गिरा था। ऐसे में बात अगर महाकुंभ की हो तो पूछना ही क्या?

पृथ्वी के इस कालखंड में यह दुनिया का सबसे बड़ा विशाल मेला है जहां हर जाति, रंग, रूप, बिरादर, पंथ और संप्रदाय मां गंगा की अविरल निर्मल धारा में आस्था की पवित्र डुबकी लगाते है और अपने आराध्य दैवीय शक्ति से पुण्य की कामना करते है जो कि सबसे बड़ा अचंभित करने वाला आश्चर्य जमावड़ा का केंद्र है। लोग तीर्थ में प्रवेश करते हैं महसूस करते हैं और आनंदित होते हैं और अपने जीवन में बार-बार आना चाहते हैं। ऐसे में अगर कुंभ को देखें तो यहां एक ही दिन एक ही समय में दुनिया के कई शहरों की आबादी इकट्ठी हो जाती है जहां कई छोटे देश यहां समा जाते है।
ये भी कम आश्चर्य नहीं है जहां कई मक्का-मदीना, वेनिस, वेटिकन और अमृतसर यहीं संगमतट तीर्थस्थल पर एकत्र हो जाता है। इसलिये महाकुंभ की भीड को देखें तो यहां कोई व्यक्ति नहीं दिखता जहां अपार भीड है और कोई भी प्रतिष्ठित व्यक्ति है जो वो भी फेसलेस है यहां इस महाकुंभ में । कौन कहां से आया? कहां जायेगा? यह जानने का कोई अर्थ नहीं रह जाता सब एक जैसा समरसता की भावना को भी जागृत करता है। अमीर-गरीब, राजा-रंक, करोड़पति-भिखारी, संत-महंत, ज्ञानी-अज्ञानी सब इस महाकुंभ में एकसमान फेसलेस हो जाते हैं।
इस भीड में, इस जन-समुद्र और तारगंगा में सबकी आध्यात्मिक चेतनायें एक दुसरे के भीतर से प्रवाहित होकर एक ऐसा विराट महाकुंभ बनाने लगती हैं जिसमें परमात्मा से साक्षात्कार की अपार क्षमता उत्पन्न हो जाती है। पलभर में बहुत कुछ घटित हो जाता है।परमानन्द की अनुभूति हो जाती है जहां भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का अनोखा संगम हो जाता है !
डा. सचिंद्रनाथ जी महाराज- पीठाधीश्वर, श्रीकुल पीठ।